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Sunday, August 1, 2021
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“कंपन बिना भी क्या जीना” – अजय दाहिया(Ajay Dahiya)

आपके समक्ष प्रस्तुत है लेख “कंपन बिना भी क्या जीना”, प्रश्न पूछा जाए कि सृष्टि एवं समस्त प्राणियों के लिए अत्यंत आवश्यक तत्त्व क्या है? तरह-तरह के जवाब आपको मिलेंगे। कोई कहेगा जल ही जीवन है, कोई कहेगा हवा, वहीं कुछ विद्वान पंचतत्व को जीवन का आधार कहेंगे। एक हद तक उनका कहना सही है, परंतु ध्यान रखें प्रश्न में सबसे अधिक महत्वपूर्ण तत्व के बारे में पूछा गया है।

अजय दाहिया

प्रस्तुत लेख के लेखक श्री अजय दाहिया (Ajay Dahiya) जी है।

वह तत्व जिसके बिना जीवन भी संभव नहीं, जीवन क्या सृष्टि व ईश्वर की सत्ता भी संभव नहीं। गीत,संगीत,नृत्य,वाद्य कुछ भी संभव नहीं, जो अच्छे और बुरे दोनों रूपों में व्याप्त है। क्या है वो ?

कहा जाता है ईश्वर के बिना एक पत्ता भी नहीं हिल सकता संभवत: ईश्वर उसी तत्व का दूसरा नाम हो क्योंकि श्रीमद्भगवद्गीता मेें जो वेदों, उपनिषदों का सार है उसमें इस बात की ओर स्पष्ट संकेत किया गया है कि ईश्वर नाम का अलग से कोई तत्व नहीं है।

अर्थात अप्रत्यक्ष रूप से उसी तत्त्व को ईश्वर कहा गया होगा जिसके बिना कुछ भी संभव नहीं। यह इकलौता ऐसा तत्व है जिसके अभाव में कोई क्रिया नहीं हो सकती। आखिर वो तत्व क्या है ?…

वो है “कंपन” जिसे अंग्रेजी में वाइब्रेशन कहा गया है। भारत परंपराओं,मान्यताओं,धार्मिक-स्थलों, ईश्वरीय सत्ता के साकार एवं निराकार स्वरूप का देश है। सिर्फ़ भारत ही नहीं पूरा विश्व ही ऐसा है। जब हम किसी प्राणी से संवाद स्थापित करते हैं तो हमारे काकू-तंत्र (वोकल कॉर्ड्स)के माध्यम से उत्पन्न कंपन ध्वनियों का रूप लेता है और ध्वनियों का समूह अक्षर एवं शब्द का रूप धारण करता है। ध्वनियों में सबसे अधिक तीव्रता “ॐ” की ध्वनि में है। कदाचित “कंपन” की इसी तीव्रता की वजह से हर मंत्र हर पूजा में यहां तक कि अधिकतर वक्ता संगीतकार भी आवाज की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए ओम के उच्चारण का अभ्यास करते हैं ताकि उनकी आवाज में अच्छे वाइब्रेशन उत्पन्न हो सके।

विश्व में जितने ध्यान केंद्र हैं अधिकांशत: उनमें रीढ की हड्डी को सीधा रखने का निर्देश होता है। ताकि शरीर उस ईश्वरीय सृष्टि के कंपन में अपना कंपन समाहित कर सके अथवा उस कंपन से अपने शरीर के कंपन को जोड़ सके, दोनों कंपनो का उचित मिलन ही आध्यात्म एवं योग है।

ह्रदय शरीर में एक ऐसा अंग है जो नाडिय़ो के माध्यम से पूरे शरीर में रक्त संचार करता है। पूरे शरीर में हड्डियों, शिराओं, धमनियों,मांसपेशियों, एवं कोशिकाओं का जाल बिछा हुआ है, ह्रदय एवं नाडियां सदैव कंपन करते हैं, शरीर का कोई ना कोई हिस्सा सदैव गतिशील रहता है।

इन्हीं कंपनो की विभिन्न आवृत्तियो के आधार पर ही प्राचीन वैद्य एवं नाड़ी विशेषज्ञ स्वास्थ्य परीक्षण करते थे। थोड़ी देर के लिए भी इस कंपन का बंद हो जाना जीवन को खत्म कर सकता है। इस कंपन के बिना जीवन संभव ही नहीं। विभिन्न प्रकार के ताल वाद्य कंपन के सहारे ध्वनिया उत्पन्न करते हैं और इन्हीं ध्वनियों के विभिन्न स्वरूप के आधार पर हम अलग-अलग ताल के नाम निर्धारित करते हैं।

दीपक राग के माध्यम से जहां वातावरण में गर्मी उत्पन्न कर “दीपक” तक जलाया जा सकता है, राग मेघ मल्हार द्वारा बारिश कराई जा सकती है, यह कंपन का प्रभाव नहीं है तो और क्या है ?..

लोक संगीत शास्त्रीय संगीत एवं पश्चिमी संगीत हमें किसी ना किसी मनोदशा में ले जाता है साथ ही उसकी प्रतिक्रिया में हमारे शरीर में हरकत होती है, वहीं दूसरी ओर दर्द भरे गीत सुनने पर हम उदास भी हो जाते हैं।

जिस व्यक्ति की आवाज में वाइब्रेशन अधिक होता है उसकी आवाज हमें दूर से ही आकर्षित करती है।

कंपन के बिना जीवन,मृत्यु, संगीत,भाषा,पंचतत्व कुछ भी संभव नहीं है यहां तक की ईश्वर भी एक प्रकार के सकारात्मक कंपन का ही नाम है।

आप ही बताइए पूरे ब्रह्मांड में कंपन के बिना क्या कुछ भी संभव है? हो तो बताइए।

हमें अपना व्यक्तित्व जिस प्रकार के सांचे में ढालना है उसी प्रकार के अच्छे या बुरे कंपन समूहों और जीवन शैली का चुनाव हमें करना होगा।

उदाहरण के लिए अश्लीलता के संपर्क में आने पर जो कंपन,विचार या मनोभाव उत्पन्न होता है, क्या सद्विचार और आध्यात्म से संपर्क स्थापित होने पर वही “कंपन” उत्पन्न होगा ? शायद नहीं ।

कंपन की उच्चतम सकारात्मक आवृत्ति को आध्यात्मिक विकास, कुंडलिनी जागरण, मेडिटेशन इत्यादि कहा जाता है।

जिसके शरीर में उच्चतम कंपन आवृत्ति होती है वह ईश्वर के सदृश पूजा जाता है, उसकी बातें प्रभावी होती हैं ।

समाज ऐसे लोगों की इज्जत करता है गौतम बुद्ध, भगवान श्री कृष्ण, शिव, श्री राम, स्वामी विवेकानंद इस तरह के अनगिनत महापुरुषों ने कंपन के सहारे ही इस प्रसिद्धि को प्राप्त किया है।

“कंपन” इतना व्यापक है, कि इस छोटे से लेख में कंपन को परिभाषित कर पाना संभव नहीं हमारे मस्तिष्क की अनंत सीमाओं से परे है “कंपन”, इसीलिए उसे ईश्वर के रूप में परिभाषित किया जाता है और यह कहना अनुचित नहीं होगा कि “कंपन बिना भी क्या जीना” इसके आगे का विचार आपके मस्तिष्क में उपस्थित “कंपनो” के विशेषण पर निर्भर करता है ।

हे सर्वेसर्वा “कंपन” महाराज आपको अनंत प्रणाम है।।

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1 COMMENT

  1. एक अच्छा विचार प्रस्तुत किया है आपने जिसमें ब्रम्हांड के सबसे महत्वपूर्ण तत्व के बारे में खोज करने के साथ-साथ उसे तर्क द्वारा प्रतिपादित करने का प्रयास भी किया है। आपके उत्तम विचार हेतु आपको साधुवाद।

    आपके विचार के समक्ष यहाँ मेरा विचार है कि इस ब्रम्हांड का सबसे आवश्यक तत्व है या इस ब्रम्हांड में हर सजीव या निर्जीव का अस्तित्व जिस एक तत्व पर निर्भर करता है वो है ‘स्थिरत।’
    ‘स्थिरता’ के बिना कुछ भी संभव नहीं। स्थिरता के बगैर दीपक रागसे अग्नि का प्रस्फुटन एक दीपक में होता है न कि एक प्रचंड अग्नि के रूप में। मेघ मल्हार से बारिश संभव होती है लेकिन चूंकि मुख्य तत्व स्थिरता है तो उससे तूफान और बाढ़ नहीं आयेगा।

    इसी तरह में समस्त तत्वों में स्थिरता को देखता हूँ जिससे उनका रूप-गुण तय होता है अन्यथा वो उत्पात मचा सकते हैं। स्थिरता के बिना कुछ भी संभब नहीं है, ‘कंपन’ भी नहीं।स्थिरता के बिना कंपन हलचल में और हलचल शोर में बदल सकता है। स्थिरता के बिना हर चीज़ असीमित हो सकती थी और फिर सृष्टि का आतित्व संभव ही नहीं होता।

    धन्यवाद आपका कि आपने वक अच्छा विचार प्रस्तुत किया जिस कारण मुझे भी एक विचार आया और इस संभंध में एक अच्छी चर्चा संभव हो सकी।
    😊🙏🍂

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