Monday, October 19, 2020
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गाँधी जी और सत्य

इस लेख की लेखिका ललिता पांडेय है, जो एक गृहणी होने के साथ – साथ साहित्यकार भी है।

गाँधी जी और सत्य,महात्मा गांधी को हम प्यार से बापू कहते हैं।भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे प्रमुख नेताओं में से हैं। सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए बापू ने देश को 200 वर्षों की पराधीनता के बाद आजादी दिलायी। वे केवल एक नेता ही नहीं बल्कि एक निष्काम कर्मयोगी, तथा सच्चे पथ-प्रदर्शक भी हैं।गांधी जी ने सम्पूर्ण जीवन सत्य और अंहिसा की पूजा की।तभी तो हम उन्हें राष्ट्रपिता कहते हैं।गाँधी जी के विचारों का भारत में ही नहीं वरन् सम्पूर्ण विश्व में सम्मान होता हैं।

गाँधी जी ने हमेशा सत्य का मार्ग अपनाया तथा सभी को सत्य का अनुसरण करने की सलाह दी।

सत्य बोलना भी एक कला हैं।ये हर किसी को नहीं आती,इसके लिए अंहकार का त्याग और अपने क्रोध को शान्त करना पड़ता है।गांधी जी सत्य और अंहिसा के पुजारी बन सम्पूर्ण संसार में सत्य और अंहिसा का परंचम फहराया।सम्पूर्ण विश्व उनकी जय-जय कार करता हैं।स्वयं भारत का हर युवा उनकी छवि जेब में लिए घूमता हैं।सत्य का पुजारी को ही अनैतिक कार्यो में सर्वप्रथम भेंट स्वरूप दिया जाता हैं।ये कैसी विडम्बना हो गई गाँधी जी के लिए।

गाँधी जी का कथन था सत्य में परमात्मा का वास होता हैं तो सत्य ईश्वर का दूसरा रूप हुआ।तभी गाँधी जी सत्य और अंहिसा के पुजारी थे।उनका सत्य रूप बचा कहाँ हैं।सत्य परिवार से प्रारम्भ होकर समाज में अपनें पंख फैलाता हैं लेकिन वर्तमान में परिवार के साथ-साथ धर्म,राजनीति सबकुछ असत्य की भेंट चढ़ चुके हैं।और हर तरफ हिंसा का बोल-बाला हैं। हम इतने हिंसक प्रवृति के हो गये हैं कि किसी का मौन होना भी हमारे व्यवहार में हिंसा की भावना पैदा कर देता हैं।

हिंसा का जन्म ही प्रेम की भावना का त्याग होने से होता हैं किसी प्रेमी को प्रेम में इन्कार मिलना और तेजाब से बदला लेना। महात्मा गाँधी का कथन था “जिस दिन से एक महिला रात में सड़कों पर स्वतंत्र रूप से चलने लगेगी, उस दिन से हम कह सकते हैं कि भारत ने स्वतंत्रता हासिल कर ली हैं।”

तो वास्तव में हम अभी भी स्वतंत्र नहीं हैं क्योंकि महिलाएं रात में क्या दिन में भी सुरक्षित नहीं हैं।तो क्या गाँधी जी का ये उक्ति सत्य नहीं होगी।ऐसा स्वर्णिम भारत कब आयेगा।जब महिलाएं भी आजादी का जश्न मना सकेगी।आज जहाँ सम्पूर्ण समाज में हिंसा का बोलबाला हैं

हिंसा सिर्फ मारना-पीटना ही नही बल्कि शब्दों का अनुचित प्रयोग भी हिंसा हैं  वर्तमान स्थिति को देखते तो गाँधी जी पर क्या बीतती।किस आज़ाद भारत की कल्पना उन्होंने की थी और क्या हो गया।अंहिसा मानव को कमजोर नहीं ताकतवर बनाती हैं। जब प्रेम और त्याग दोनों रूप हमारे अन्दर समाहित होंगे तभी सत्य और अंहिसा का दीप प्रज्वलित होगा और प्रकाशमान होगी ये धरा। 

रूप सत्य का तुमने

असत्य कर दिया

मेरे श्वेत वस्त्र में तुमने 

रंग हिंसा का छिड़क दिया।

कर रहा हूँ गुजारिश प्रेम का

मेरे कोरे दामन में,

रखो क़दम आशीष का

हो गया हूँ वृद्ध फिर भी

साथ तुम्हारा निभा रहा।

मौन होकर ही चाहें

जेब में पड़ा रहा।

थाम लो हाथ तुम भी सत्य का

ये परमात्मा की ही उक्ति हैं

इस युग में।

गाँधी जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं।।

‘ललिता पाण्डेय’

दिल्ली

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